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Who is God ? प्रणाम यज्ञ

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Who is God ? प्रणाम यज्ञ #यथार्थ_भक्ति_बोध_Part5 के आगे पढ़ें   📖📖📖 #यथार्थ_भक्ति_बोध_Part6  4- ‘‘प्रणाम यज्ञ’’ भक्ति व साधना उसी साधक की सफल होती है जिसमें नम्रता (आधीनी) होती है, दास भाव होता है। गरीब, आधीनी के पास है पूर्ण ब्रह्म दयाल। मान बड़ाई मारिए बे अदबी सिरकाल।। दासा तन में दर्श है सब का होजा दास। हनुमान का हेत ले रामचन्द्र के पास।। विभीषण का भाग बड़ेरा, दास भाव आया तिस नेड़ा।। दास भाव आया बिसवे बीसा, जाकूं लंक देई बकशीशा।। दास भाव बिन रावण रोया, लंक गंवाई कुल बिगोया।। भक्ति करी किया अभिमाना, रावण समूल गया जग जाना।। ऐसा दास भाव है भाई। लंक बखसते बार ना लाई।। तातें दास भाव कर भक्ति कीजै, सबही लाभ प्राप्त कीजै।। गरीब बेअदबी भावै नहीं साहब के तांही, अजाजील की बन्दगी पल मांहे बहाई।।  उपरोक्त अमृतवाणी सूक्ष्मवेद की है। इनका भावार्थ है कि भक्त में विनम्रता होनी चाहिए। जिस कारण से भक्त की भक्ति सफल होती है। यदि भक्त साधना भी करता है और अहंकार भी रखता है तो उसकी साधना व्यर्थ हो जाती है। उदाहरण दिए हैं...

परमात्मा का अपमान

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       परमात्मा का अपमान          जिसे गायत्री मन्त्र कहते हो, वह यजुर्वेद के अध्याय 36 का मन्त्र 3 है जिसके आगे ‘‘ओम्‘‘ अक्षर नहीं है। यदि ‘‘ओम्’‘ अक्षर को इस वेद मन्त्र के साथ जोड़ा जाता है तो परमात्मा का अपमान है क्योंकि ओम् (ऊँ) अक्षर तो ब्रह्म का जाप है। यजुर्वेद अध्याय 36 मन्त्र 3 में परम अक्षर ब्रह्म की महिमा है। यदि कोई अज्ञानी व्यक्ति पत्र तो लिख रहा है प्रधानमन्त्री को और लिख रहा है सेवा में ‘मुख्यमन्त्री जी’ तो वह प्रधानमन्त्री का अपमान कर रहा है। फिर बात रही इस मन्त्र यजुर्वेद के अध्याय 36 मन्त्र 3 को बार-बार जाप करने की, यह क्रिया मोक्षदायक नहीं है। मन्त्र का मूल पाठ इस प्रकार है :- भूर्भवः स्वः तत् सवितु वरेणीयम् भृगो देवस्य धीमहि धीयो योनः प्रयोदयात्। अनुवाद :- (भूः) स्वयंभू परमात्मा पृथ्वी लोक को (भवः) गोलोक आदि भवनों को वचन से प्रकट करने वाला है (स्वः) स्वर्गलोक आदि सुख धाम हैं। (तत्) वह (सवितुः) उन सर्व का जनक परमात्मा है। (वरेणीयम) सर्व साधकों को वरण करने योग्य अर्थात् अच्छी आत्माओं के भक्ति योग्य है। (भृगो)...